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such likhne ka aadi hun

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rudrapunj


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बोलो हर-हर-हर महादेव !

Posted On: 20 Feb, 2012  
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मांगें वोट माफिया , उसको मार भगाओ |

Posted On: 14 Feb, 2012  
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धोनी धोकर रख दे जब , बदलेगी तस्वीर

Posted On: 12 Feb, 2012  
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कागज के हैं शेर , फील्ड में बिलकुल लल्ला |

Posted On: 15 Jan, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा: chandanrai chandanrai

रुद्र्जी , इतने सुलझे हुए विचार प्रस्तुत करने वाले आलेख के लिए आपको साधुवाद देता हूँ. दरअसल यह देश को जोड़ने वाली राजनीती ना होकर बांटने और तोड़ने वाली राजनीति बन चुकी है. आपने ठीक कहा किजब हम खुद विकास का आधार छोड़ कर, जाती, धर्म और सामाजिक स्थिति (दलित आदि वर्ग) के नाम पर वोट डालते हैं तो यह सिलसिला जैसे चलता आया है वैसे ही चलेगा. हाँ, एक बात मेरे ज़हन में बार बार उठती है की आंकड़ों (statistics ) के हिसाब से भारत की जनसँख्या में युवकों 28 से 32 साल का प्रतिशत अधिक है और मैं यह भी मानता हूँ की युवा वर्ग का झुकाव जाती-धर्म वाद में इतना नहीं है ; लिहाजा यह युवा वर्ग भारत की तकदीर बदल सकता है परन्तु ऐसा तभी होगा जब युवा एवं एनी जागरूक लोग इस परंपरा को तोदेंगें. पर मुझे लगता है इन में से अधिकांस वोट देने जाते ही नहीं. तो फिर आप ही बतास्यें की गिला शिकवा किस बात का. प्रतिक्रिया चाहूँगा.

के द्वारा:

आपके इस मत पर मैं आपके साथ हूँ..... अपने ब्लॉग मे मैं इस घटना के प्रति अपनी असहमति जता भी चुका हूँ…. वास्तव मे जिसे हम जनता का आक्रोश कह कर बढ़ावा दे रहे हैं…… वो अराजकता को बढ़ावा देने की बात है…. आप अगर कुछ सही कर रहे हैं तो भी आपके कई विरोधी खड़े हो जाते हैं…… जैसा की आप जानते ही है…. की इस बेईमान दुनिया मे ईमानदार व्यक्ति से अधिक दुश्मन किसी के नहीं होते है…. पुलिस के निर्ममता का एक कारण ये भी है की उसको अपराधियों के साथ मारपीट करते देखने के आदि हो चुके हम लोग जब किसी बेकसूर को भी पीटता देखते हैं तो बरबस ही ये मान लेते हैं की ये भी अपराधी ही होगा… और एक बेकसूर यूं ही पीट जाता है….. आक्रोश के नाम पर कल इसी तरह के लोग हर उस व्यक्ति को भी इसी तरह मारने लग सकते हैं जो की इनके किसी भी कृत्य का विरोध करेगा……. अफसोस इस बात का है की आज इस व्यक्ति का समर्थन करने वालों का मतदान वाले दिन वोट या तो जाति या धर्म या क्षेत्र या फिर नोट के लिए पड़ेगा…… और या फिर कुछ बुद्धिजीवी उस दिन मतदान से ही दूरी बनाए रखेंगे……

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

समाज का अर्थ है सचेतन और वैचारिक शक्ति रखने वाले प्राणियों का समूह। हमारे समाज की प्रशासनिक व्यवस्था लोकतन्त्र पर आधारित है, और लोकतन्त्र का सबसे बड़ा अस्त्र है अपने विचारों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति, अपने मान्य धर्म या परम्पराओं का पालन करने की स्वतन्त्रता। लेकिन इसी के साथ एक शब्द और जुड़ता है वह है मर्यादा। हमें बोलने की, अपने भाव अन्य तरीकों से अभिव्यक्त करने की आजादी है, परन्तु मर्यादित ढंग से। परन्तु इस मर्यादा की दीवार में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लम्बे समय से छेद किया जा रहा है, जो अब बहुत बड़ा हो गया है, और उसमें से दुर्गन्ध का झोंका भी आने लगा है। इसका उदाहरण चैनलों पर दिखाये जाने वाले विग्यापनों में दिखने लगा है। यह दुर्गन्ध सुगन्ध के एक छद्म आवरण में लिपटी हुई है, जिससे तत्काल इसका आभास नहीं हो रहा है। हम एक उदाहरण लें- शौच करना प्रत्येक व्यक्ति की दैनिक आवश्यकता है, न इसपर समाज रोक लगा सकता है न  कानून। परन्तु इस कार्य के लिये हम ऐसे स्थान का चुनाव करते हैं, जहाँ  अन्य किसी की निगाह न पड़े। अपनी पत्नी से प्रेम व्यक्त करने का प्रत्येक  विवाहित को सामाजिक, धार्मिक,कानूनी अधिकार  प्राप्त है, परन्तु वह किसी सार्वजनिक स्थल पर या खुले  में यह कार्य नहीं करता है, क्योंकि वह सामाजिक मर्यादा को महसूस करता है। यही मर्यादा हमें विचारों की अभिव्यक्ति के समय भी ध्यान रखना चाहिये। किसी भी बात के पक्ष और विपक्ष में तर्क-कुतर्क दिये जा सकते हैं, परन्तु मर्यादित ढंग से। इस मर्यादा की कोई व्याख्या नहीं है, यह एक अव्यक्त भाव है, जो वर्तमान में छिन्न-भिन्न हो गया है, इसे फिर से निर्मित किया जाना चाहिये।

के द्वारा:




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